हरिद्वार – हरिद्वार नगर निगम कार्यालय परिसर में फैली गंदगी आखिरकार साफ तो कर दी गई, लेकिन यह सफाई व्यवस्था पर नहीं बल्कि नगर आयुक्त की कार्यशैली पर सवाल खड़े कर गई। हकीकत यह है कि यह गंदगी ढाई साल तक इसलिए नहीं हट पाई क्योंकि नगर निगम के पास न तो पर्याप्त सफाई कर्मचारी थे और न ही सफाई के लिए बजट। मौके पर जो सफाई करता दिखा, उसमें एक नाममात्र का सफाई कर्मचारी था, जबकि दूसरा सड़क से कूड़ा बीनने वाला आम व्यक्ति। चौंकाने वाली बात यह रही कि इस सफाई के बदले उसे मेहनताना नहीं, बल्कि निगम परिसर में पड़ा प्लास्टिक का कूड़ा “इनाम” के तौर पर दे दिया गया।
आयुक्त के दावे बनाम जमीनी हकीकत, सफाई नायक की सफाई।
नगर निगम के सफाई नायक ने मामले पर सफाई देते हुए दावा किया कि यह कूड़ा सालों पुराना नहीं बल्कि कुछ दिनों का है। उनका कहना है कि यह वही सामान है जो अतिक्रमण अभियान के दौरान जब्त किया जाता है और फिर निगम परिसर में रखा जाता है। नियमों के अनुसार तय समय बाद इस जब्त सामान की नीलामी होती है या फिर अतिक्रमणकारी चालान भरकर अपना सामान छुड़ा सकते हैं। लेकिन सवाल यह है कि अगर सब कुछ नियमों से चलता है तो यह सामान नीलामी से पहले “उपहार” कैसे बन गया?
आयुक्त की निगरानी में जब्त माल बना ‘इनाम’
नगर निगम ने अतिक्रमणकारियों से जब्त किया गया सामान एक ऐसे व्यक्ति को दे दिया, जिसे सड़क से गंदगी साफ करने के लिए बुलाया गया था। यानी जो सामान कानूनी प्रक्रिया के तहत निगम की जिम्मेदारी था, वह बिना किसी लिखित प्रक्रिया के हाथों-हाथ दे दिया गया। यह तस्वीर साफ इशारा करती है कि नगर निगम में जब्ती और निस्तारण की प्रक्रिया कितनी मनमानी हो चुकी है। अगर यही व्यवस्था है तो फिर अतिक्रमण अभियान का मकसद क्या रह जाता है? सबसे बड़ा सवाल यही है कि जिस सामान की कीमत हजारों रुपये थी, जिसे अतिक्रमणकारी मामूली जुर्माना भरकर वापस ले सकते थे, वह अब उन्हें कभी क्यों नहीं मिलेगा? क्या यह फैसला किसी नियम के तहत लिया गया या फिर यह नगर आयुक्त की मौन स्वीकृति से हुआ? जिस आम आदमी को यह “उपहार” दिया गया, वह नए साल की खुशी में नहीं बल्कि निगम की नाकामी ढकने के बदले दिया गया इनाम था।
नगर निगम में हुई सफाई से छोटे व्यापारी को बड़ा नुकसान।
इस ‘उपहार व्यवस्था’ का सबसे बड़ा नुकसान उन अतिक्रमणकारियों को हुआ, जिनका हजारों रुपये का सामान मामूली चालान भरने पर वापस मिल सकता था। अब वह सामान न नीलामी में जाएगा, न वापस मिलेगा—क्योंकि उसे पहले ही “सफाई के बदले सौंप” दिया गया।यह पूरा मामला नगर निगम की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े करता है। क्या निगम में कानून का राज है या फिर फैसले मौके पर तय होते हैं?
