जनपद पिथौरागढ़ में 130 पर्यावरण बटालियन के विस्थापन आदेश के विरोध में आज एक महत्वपूर्ण जनहित बैठक आयोजित की गई, जिसमें सामाजिक संगठनों, बुद्धिजीवी वर्ग, घटक दलों, विभिन्न राजनीतिक दलों एवं जनप्रतिनिधियों की सहभागिता रही। बैठक में सर्वसम्मति से इस आदेश को दुर्भाग्यपूर्ण, जनविरोधी तथा हिमालय जैसे अति संवेदनशील क्षेत्र के लिए अत्यंत खतरनाक बताया गया।
बैठक में वक्ताओं ने स्पष्ट कहा कि पिथौरागढ़ एवं संपूर्ण सीमांत हिमालय क्षेत्र पर्यावरणीय दृष्टि से अत्यधिक संवेदनशील है, जहाँ 130 पर्यावरण बटालियन वर्षों से पर्यावरण संरक्षण, वृक्षारोपण, जलस्रोत संरक्षण तथा भूमि संरक्षण के क्षेत्र में अनुकरणीय कार्य कर रही है। विगत वर्षों में बटालियन द्वारा करोड़ों पौधों का रोपण, 11 लाख नालियों से अधिक भूमि पर संरक्षण एवं वृक्षारोपण कार्य, जलधाराओं के पुनर्जीवन तथा मिट्टी कटाव रोकने जैसे अनेक महत्वपूर्ण कार्य किए गए हैं, जो हिमालय के पर्यावरण संतुलन को बचाने में एक ऐतिहासिक योगदान है।
बैठक में यह प्रश्न पूरे जोर के साथ उठाया गया कि अरावली पर्वत श्रृंखला का संरक्षण आवश्यक है, किंतु अरावली को बचाने के लिए हिमालय की कुर्बानी देना कितना उचित है? हिमालय केवल उत्तराखंड का नहीं बल्कि पूरे देश की जीवनरेखा है। हिमालय से निकलने वाली नदियाँ, जल स्रोत, जैव विविधता और जलवायु संतुलन पूरे उत्तर भारत को जीवन देते हैं। यदि हिमालय कमजोर होगा, तो परिणाम केवल पिथौरागढ़ तक सीमित नहीं रहेंगे—यह संकट देश की सुरक्षा, पर्यावरण और जल भविष्य तक पहुंचेगा। बैठक में यह भी कहा गया कि 130 पर्यावरण बटालियन केवल पर्यावरण संरक्षण की इकाई नहीं है, बल्कि यह जनपद के लिए रोजगार एवं आर्थिक स्थिरता का एक मजबूत आधार है। इस बटालियन के माध्यम से जनपद के लगभग 500 पूर्व सैनिकों एवं युवाओं को रोजगार प्राप्त होता है तथा इसके कारण स्थानीय बाजार, परिवहन, व्यापार एवं जनपद की आर्थिक गतिविधियाँ भी संचालित होती हैं। ऐसे में इस बटालियन का विस्थापन जनपद की अर्थव्यवस्था पर सीधा प्रहार है।
बैठक में अत्यंत दुःख एवं आक्रोश के साथ यह भी कहा गया कि उत्तराखंड से लोकसभा में प्रतिनिधित्व करने वाले पाँच सांसदों की चुप्पी जनभावनाओं को आहत करने वाली है। जनपद की पीड़ा पर मौन रहना और सांसद निधि का अन्य राज्यों में उपयोग होना, सीमांत क्षेत्र की उपेक्षा का स्पष्ट प्रमाण है। इसके साथ ही क्षेत्र तथा राजनीति के प्रतिनिधियों द्वारा इस मामले पर चुप्पी साधना भी एक प्रश्न चिन्ह खड़ा करता है। वक्ताओं ने कहा कि यह केवल प्रशासनिक निर्णय नहीं, बल्कि सीमांत जनपद के साथ अन्याय है, जिसे अब किसी भी कीमत पर स्वीकार नहीं किया जाएगा। बैठक में सीनियर सिटीजन, विश्व हिंदू परिषद, बजरंग दल, पतंजलि योग समिति, अखिल भारतीय समानता मंच, उत्तराखंड क्रांति दल सहित विभिन्न सामाजिक संगठनों एवं जनसमूहों द्वारा इस संघर्ष को जन आंदोलन का रूप देने हेतु पूर्ण समर्थन देने की घोषणा की गई। बैठक में उपस्थित प्रमुख लोगों में दयानंद भट्ट, राजेंद्र सिंह, जगदीश पांडे, सागर जोशी, भास्कर आनंद जोशी, विपिन जोशी, के.एस. भाटिया, राम सिंह, पूर्व विधायक काशी सिंह ऐरी जी सहित सैकड़ों बुद्धिजीवी वर्ग एवं पूर्व सैनिक उपस्थित रहे।
बैठक में सर्वसम्मति से यह निर्णय लिया गया कि यदि सरकार एवं संबंधित मंत्रालय द्वारा शीघ्र ही इस विस्थापन आदेश को निरस्त नहीं किया गया, तो दिनांक 16 फरवरी से जनपद स्तर पर व्यापक जन आंदोलन प्रारंभ किया जाएगा, जो लोकतांत्रिक लेकिन निर्णायक होगा। यह आंदोलन अब केवल संगठन का नहीं, बल्कि जनपद पिथौरागढ़ की एकजुट आवाज बनकर उठेगा। बैठक में यह भी चेतावनी दी गई कि यदि सरकार ने जनभावनाओं की अनदेखी की, तो आने वाले समय में इसका विरोध केवल जनपद तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि यह आंदोलन राज्य एवं राष्ट्रीय स्तर तक ले जाया जाएगा। यह लड़ाई केवल एक बटालियन की नहीं है—यह लड़ाई हिमालय को बचाने, सीमांत को बचाने, रोजगार को बचाने और आने वाली पीढ़ियों के भविष्य को बचाने की है। अब प्रश्न यह नहीं कि हम बोलेंगे या नहीं, प्रश्न यह है कि यदि आज हम चुप रहे, तो कल हमारी पीढ़ियाँ हमें माफ नहीं करेंगी।
