हरिद्वार – डिजिटल युग में जहां सोशल मीडिया को संवाद और जनहित का मंच माना जाता है, वहीं हरिद्वार में एक ऐसा वर्चुअल दरबार चर्चा में है, जहां तस्वीर कुछ अलग ही नजर आ रही है। यहां कथित तौर पर जनसेवा का जिम्मा उठाने वाले कुछ जिम्मेदार चेहरे और अवैध कारोबार की दुनिया से जुड़े ‘रंगीन किरदार’ एक ही छत के नीचे सक्रिय बताए जा रहे हैं।आज के दौर में सोशल मीडिया ने दूरियों को खत्म किया है, लेकिन हरिद्वार में यह मंच अब एक ऐसे संगम में बदलता दिख रहा है, जहां कानून समझाने वाले और कानून से खेल करने वाले एक ही कतार में खड़े दिखाई दे रहे हैं। चर्चा यह है कि इस मंच पर शराब, सट्टा और खनन जैसे कारोबार से जुड़े लोग भी सक्रिय हैं और दिलचस्प यह कि उनके साथ कुछ ऐसे चेहरे भी मौजूद हैं, जिन पर व्यवस्था संभालने की जिम्मेदारी है।
मुद्दा उठते ही ‘सतर्क’ हो जाते हैं परदे के खिलाड़ी 
बताया जाता है कि जैसे ही किसी अवैध गतिविधि से जुड़ा मुद्दा इस मंच पर उभरता है, वैसे ही ‘कुछ खास सदस्य’ अचानक बेहद सक्रिय हो जाते हैं। मानो सूचना का आदान-प्रदान उतनी तेजी से होता है, जितनी तेजी से कार्रवाई होनी चाहिए। ऐसे में सवाल उठता है कि यह मंच जनहित का है या फिर “अलर्ट सिस्टम” का नया जरिया?
जनहित बनाम ‘जुगाड़ तंत्र’
दिलचस्प पहलू यह भी है कि इसी मंच के जरिए कई बार जनहित के मुद्दे उठते हैं और समाधान भी निकलता है। लेकिन जैसे ही कोई सदस्य संवेदनशील या असुविधाजनक सच सामने लाने की कोशिश करता है, तो उसकी आवाज अचानक गायब हो जाती है। आरोप यह भी हैं कि मुद्दा उठाने वाले को ही कठघरे में खड़ा कर दिया जाता है मानो सच्चाई से ज्यादा ‘सिस्टम’ की सुविधा अहम हो।
एक ही मंच पर ‘निगरानी’ और ‘निशाना’
चर्चाओं में यह भी सामने आ रहा है कि इस मंच पर ऐसे लोग भी सक्रिय हैं, जिन पर पहले से ही शराब, सट्टा या अवैध खनन से जुड़े मामले दर्ज बताए जाते हैं। ऐसे में यह स्थिति सवाल खड़ा करती है,क्या यह केवल संयोग है या फिर डिजिटल नेटवर्किंग का नया मॉडल?
जहां एक ओर निगरानी की जिम्मेदारी वाले लोग हैं, वहीं दूसरी ओर वे भी मौजूद बताए जा रहे हैं, जिन पर निगरानी रखी जानी चाहिए। यह समीकरण अपने आप में कई परतें खोलता है।
सवाल सिस्टम पर, जवाब किसके पास?

अब बड़ा सवाल यही है कि क्या इस तरह के मंचों की गतिविधियों से संबंधित विभाग पूरी तरह अनजान हैं, या फिर यह सब खुले राज की तरह स्वीकार कर लिया गया है?क्या यह वाकई जनहित का मंच है, या फिर पर्दे के पीछे चल रहे किसी डिजिटल तालमेल की झलक?
हरिद्वार की यह कहानी सिर्फ एक सोशल मीडिया ग्रुप की नहीं, बल्कि उस सोच की है जहां नियम बनाने वाले और नियम तोड़ने वाले दोनों एक ही चैट बॉक्स में मौजूद हैं।
और सवाल अब भी कायम है,क्या यह संवाद है… या समझौते का नया दौर?
