हरिद्वार – उत्तराखंड के सबसे अहम जिलों में शुमार हरिद्वार सिर्फ एक जनपद नहीं, बल्कि प्रशासनिक परीक्षा की कसौटी है। कुंभ मेला, कांवड़ यात्रा, गंगा स्नान, औद्योगिक क्षेत्र और बड़े संस्थानों की मौजूदगी हरिद्वार में प्रशासन की भूमिका हर दिन अग्निपरीक्षा जैसी रहती है। यही वजह है कि उत्तराखंड कैडर के अधिकांश अधिकारी इस जिले में तैनाती की इच्छा रखते हैं।लेकिन हरिद्वार की तस्वीर तब उलझती है, जब कुछ अधिकारी पोस्टिंग तो ले लेते हैं, लेकिन जिम्मेदारी से दूरी बनाए रखते हैं। कुर्सी पर नाम दर्ज रहता है, लेकिन जनता के सवालों के समय वही कुर्सी खाली नजर आती है।इसके ठीक उलट तस्वीर जिलाधिकारी मयूर दीक्षित की है। अवकाश के दिन भी जिलाधिकारी जनता के बीच पहुंचते हैं, समस्याएं सुनते हैं, और खुद मौके पर जाकर साफ-सफाई व व्यवस्थाओं का निरीक्षण करते हैं। प्रशासनिक सख्ती और संवेदनशीलता का यह चेहरा हरिद्वार में साफ दिखाई देता है।
लेकिन इसी प्रशासनिक ढांचे में एक अहम ‘सीट’ ऐसी भी है, जो दोपहर होते-होते लापता हो जाती है। स्थानीय स्तर पर चर्चा आम है कि इस सीट पर बैठने वाला अधिकारी दोपहर एक बजे के बाद न जनता को मिलता है, न कार्यालय में दिखता है। सवाल यह नहीं कि अधिकारी व्यस्त है, सवाल यह है कि जनता की समस्याएं आखिर सुनी कहां जा रही हैं?
यह कोई साधारण कुर्सी नहीं है।
यह कोई साधारण कुर्सी नहीं है। शहर के बीचो-बीच स्थित इस सीट पर बैठने वाला अधिकारी आने वाले वर्षों में जिले की पूरी कमान संभालने की स्थिति में पहुंचता है। यही कारण है कि अतीत में इस सीट को लेकर करोड़ों के खेल और विवाद भी सामने आ चुके हैं। कभी आर्थिक अनियमितताओं के आरोप, तो कभी जनता से दूरी इस कुर्सी का इतिहास सवालों से भरा रहा है।आज भी हालात ज्यादा बदले हुए नजर नहीं आते। कुछ अधिकारी या तो निजी कार्यों में व्यस्त होकर दोपहर बाद गायब हो जाते हैं, या फिर आवास से बैठकर ही सरकारी काम चलाने की बात कहते हैं। लेकिन जनता के बीच पहुंचकर समस्याएं सुनना, मौके पर जाकर हालात देखना यह जिम्मेदारी कहीं पीछे छूट जाती है।
ऐसे माहौल में जिलाधिकारी मयूर दीक्षित की सक्रियता एक स्पष्ट संदेश देती है,प्रशासन कुर्सी से नहीं, मैदान से चलता है। अब सवाल यह है कि जब जिलाधिकारी खुद अवकाश में सड़क पर उतर सकते हैं, तो अहम सीटों पर बैठे अधिकारी आखिर किस काम में लापता हो जाते हैं?
