-योगऋषि पूज्य स्वामी रामदेव जी महाराज के पावन आशीर्वाद व मार्गदर्शन में पूज्य आचार्य बालकृष्ण जी के नेतृत्व में आयोजित
-जगतगुरू शंकराचार्य जी महाराज, परम पूज्य श्री कार्ष्णि पीठाधीश्वर गुरु शरणानंद जी महाराज, परमार्थ पीठाधीश्वर पूज्य स्वामी चिदानन्द सरस्वती जी महाराज, मलूकपीठाधीश्वर पूज्य स्वामी राजेंद्र दास जी महाराज, गीता मनीषी पूज्य ज्ञानानन्द जी महाराज, पूज्य माधवप्रिय स्वामी जी महाराज, महामंडलेश्वर स्वामी हरिचेतनानन्द जी, पूज्य स्वामी सतुआ बाबा जी, कैवल्य पीठाधीश्वर पूज्य स्वामी अविचलदास जी महाराज, पूज्य स्वामी भागवत स्वरूप जी महाराज, विश्व जागृति मिशन के संत श्री सुधांशु जी महाराज, श्री पुण्डरीक गोस्वामी जी, अखिल भारतीय संत समिति के राष्ट्रीय महामंत्री पूज्य श्री स्वामी जितेन्द्रानंद सरस्वती जी महाराज, पूज्य स्वामी परमात्मानन्द जी महाराज, नाथ सम्प्रदाय के पूज्य स्वामी निर्मलानन्द जी महाराज, पूज्य प्रसन्न तीर्थ जी महाराज, स्वामी भद्रेश जी महाराज सहित अनेक पूज्य संतों का पावन सान्निध्य
-विश्व हिन्दू परिषद् के अध्यक्ष श्री आलोक कुमार जी, श्री सुरेन्द्र जी, केंद्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. श्रीनिवास वरखेड़ी जी, आरएसएस के श्री रामलाल जी सहित अनेक विभूतियों की गरिमामयी उपस्थिति
-सनातन धर्म शिक्षा तंत्र के अनुरूप देश की शिक्षा पद्धति हो, इसका आह्वान
-पूज्य संतों के मार्गदर्शन में घोषणापत्र का निर्माण
-ओरिजिनल पांडुलिपियों को एकत्र करने का आह्वान
-वेद परंपरा के शुद्धतम स्वरूप को सभी के समक्ष लाने हेतु अद्भुत प्रयास
हरिद्वार। हरिद्वार स्थित पतंजलि विश्वविद्यालय में 29 से 31 अक्टूबर 2026 तक आयोजित तीन दिवसीय 52वें अखिल भारतीय प्राच्यविद्या सम्मेलन का शुभारम्भ भारतीय ज्ञान, दर्शन, संस्कृत और सनातन शास्त्रीय परंपरा के संरक्षण एवं संवर्धन के संकल्प के साथ हुआ।
सम्मेलन का एक प्रमुख विमर्श सनातन शास्त्रों की प्रामाणिकता, मूल पाठों के संरक्षण, प्रक्षिप्त अंशों के शास्त्रीय परीक्षण तथा शास्त्रों की प्रामाणिक व्याख्या से जुड़ा है। इस संदर्भ में सनातन शास्त्र शुद्धिकरण अभियान को लेकर विशेष चर्चा हो रही है। इसका उद्देश्य मूल ग्रंथों, उनकी परंपरागत व्याख्याओं और प्रामाणिक स्रोतों के आधार पर भारतीय ज्ञान परंपरा के वास्तविक स्वरूप को सामने लाना है।
योगगुरु स्वामी रामदेव जी महाराज ने इस अभियान के संदर्भ में शास्त्रों में प्रक्षिप्त अंशों, गलत व्याख्याओं और मूल ग्रंथों के प्रामाणिक अध्ययन की आवश्यकता पर बल दिया है। इस दिशा में वेद, उपनिषद, रामायण, महाभारत, पुराण, दर्शन एवं संस्कृत के मूल ग्रंथों के गंभीर अध्ययन और प्रामाणिक प्रकाशन की आवश्यकता पर विचार प्रस्तुत किया गया है।
सम्मेलन में संस्कृत भाषा, वेद-वेदांग, भारतीय दर्शन, इतिहास, योग, आयुर्वेद, प्राचीन चिकित्सा पद्धतियों और भारतीय ज्ञान परंपरा के विविध आयामों पर विद्वत् विमर्श हो रहा है। इसके साथ ही युवा शोधार्थियों और महिला विदुषियों को भी अपने शोध एवं शास्त्रीय चिंतन प्रस्तुत करने के अवसर दिए जा रहे हैं।
सम्मेलन की विशेषता यह है कि यहाँ प्राचीन ज्ञान परंपरा को केवल अतीत की धरोहर के रूप में नहीं, बल्कि वर्तमान और भविष्य के निर्माण की आधारशिला के रूप में देखने का प्रयास किया जा रहा है।
जगद्गुरु शंकराचार्य जी महाराज ने कहा कि भारत में शिक्षा, शासन एवं व्यवहार सनातन धर्मावलंबी होना चाहिए।
परम पूज्य श्री कार्ष्णि पीठाधीश्वर गुरु शरणानंद जी महाराज ने कहा कि हमें बाहर वालों से भय नहीं, जितना अपनों से है। वेद वाणी अमर है और उसके मूल में जो है, जो सत्य है, जो विराट है, जो समग्रता है, उससे सभी को अवगत कराना होगा। हमारी संस्कृति में विचार आत्मा से निकलता है, एआई से नहीं। वेद व वाङ्मय अत्यंत पवित्र हैं। ऐसी विद्या का प्रसार होना चाहिए। अर्थ का अनर्थ नहीं होना चाहिए। उन्होंने कहा कि हमारे शास़्त्रों में सत्य से बड़ी चीज है वह है रीत उसका पालन करना अनिवार्य है।
परमार्थ पीठाधीश्वर, पूज्य स्वामी चिदानन्द सरस्वती जी महाराज ने कहा कि कुम्भ से पूर्व सनातन वैदिक संस्कृति को उसके मूल स्वरूप में लाने के लिये पूज्य स्वामी रामदेव जी महाराज और आचार्य श्री बालकृष्ण जी ने मिलकर योग व आयुर्वेद के क्षेत्र में अद्भुत कार्य किया है। यह आप दोनों की साधना की दिव्यता है और संकल्प का विस्तार है।
उन्होंने कहा कि आज समाज में सबसे बड़ा संकट सोच का है। सनातन की यात्रा प्रतिरोध की यात्रा नहीं, शोध की यात्रा हैय बदले की नहीं, बदलाव की यात्रा हैय यह विरोध की यात्रा नहीं, सहयोग की यात्रा है। सनातन पूरे विश्व के लिये, सबके लिये साँस लेता है। वेद ही हमारे राष्ट्र का संविधान है और वेद ही हमारे राष्ट्र का समाधान है। आज हमें सोते हुए समाज को जगाना है। आक्षेप भी सनातन नहीं है और प्रक्षिप्त भी सनातन नहीं है।
स्वामी जी ने कहा कि सनातन रोग नहीं, योग है, जो सबको जोड़ता है। सनातन बीमारी नहीं है, सनातन तो इलाज है, बीमारियों का समाधान है। समाधान डेंगू नहीं, डिवाइन है। ये शास्त्रों की शुद्धि की यात्रा नहीं पूरे भारत के शुद्धि की यात्रा है। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस से हमें ऋषि इंटेलिजेंस की ओर बढ़ना होगा। ऋषियों की सनातन बुद्धि ने हमें ध्येय दिया, बुद्धि दी, प्रज्ञा दी, ज्ञान दिया। इसी यात्रा को आगे लेकर जाना होगा। धैर्य से, एक होकर काम करना होगा।
गीता मनीषी पूज्य ज्ञानानन्द जी महाराज ने कहा कि वेदों व शास्त्रों से प्रक्षिप्त अशं निकलेगा तो वेदों का विशुद्ध रूप निखर कर आयेगा इसलिये इन्हें निकालना आवश्यक है। एआई केवल आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस न बने, बल्कि एक्चुअल इंटेलिजेंस बने।
पूज्य माधवप्रिय स्वामी जी महाराज ने कहा कि कुछ काम प्रवचन व प्रक्षिप्त निकालने से नहीं होता, व्यवहार से होता है। हम एआई का विरोध करने वाले नहीं हैं। साइंस का विकास होगा, ज्ञान का विकास होगा, उसे सँभालना कैसे है, इसका विचार करना होगा। आज के युवाओं को संदेश दिया कि आपको एआई का गुलाम नहीं, मास्टर बनना है। हमें भारत की प्राचीन ज्ञान परम्परा को फीड करना है। इसके लिए हमें संस्कृत के स्कॉलर्स चाहिए।
म. म. पूज्य स्वामी गोविंददेव गिरि जी महाराज ने वर्चुअल जुड़कर कहा कि धर्मशास्त्रों का चिंतन करने के लिए सभी पूज्य संतों को एक मंच पर एकत्र करने हेतु स्वामी रामदेव जी व आचार्य बालकृष्ण जी को अनेकों साधुवाद देते हुए कहा कि धर्मशास्त्रों में जो प्रक्षिप्त अंश हैं, उन्हें निकालने के लिए समिति का गठन नितांत आवश्यक है। हमारे शास्त्रों में जो प्रक्षिप्त अंश हैं, उन्हें हटाना व छाँटना अत्यंत आवश्यक है।
म. म. पूज्य स्वामी अवधेशानन्द गिरि जी महाराज ने वर्चुअल जुड़कर कहा कि बहुत सारे लोग यह प्रयास कर रहे हैं कि भारत की संस्कृति और संस्कारों पर प्रहार हो। इसलिए हम सबको एकमत होकर हमारे शास्त्रों, संस्कारों और संस्कृति को युवा पीढ़ी में रोपित करना होगा। हम सबको एक साथ आना होगा और सारे भेदों को मिटाना होगा। यह प्रयास अत्यंत ही अनुकरणीय है। पूज्य संतों की सामूहिक सामर्थ्य से देश के कल्याण का मार्ग प्रशस्त करने की बात कही।
मलूकपीठाधीश्वर पूज्य स्वामी राजेंद्र दास जी महाराज ने कहा कि सभी पूज्य संत एक मंच और एक विचार में रहें। हम सभी पूज्य अनेक होते हुए भी एक हैं और एक रहें। वेद-अनुकूल वाणी प्रमाण है, इसलिए वैदिक सिद्धांतों के विरोधी वाणी को स्वीकार न करें। आज के युवाओं को पवित्र दृष्टि, पवित्र आहार और शुद्ध विचार की आवश्यकता है। भारतवर्ष की धरती गोवध से मुक्त हो, ऐसा संकल्प कराने का आह्वान किया।
विश्व जागृति मिशन के संत श्री सुधांशु जी महाराज ने कहा कि सनातन के पवित्र ग्रंथों को शुद्ध करना, संशोधन करना नितांत आवश्यक है। वेद, स्मृति व सदाचरण की आज आवश्यकता है।
पूज्य स्वामी जितेन्द्रानन्द जी महाराज ने कहा कि हमारी मनुस्मृति की मूल प्रतियाँ हमारे पास होनी चाहिए, जो हमारे देश से विदेशी ताकतों ने अपने कब्जे में रख दी हैं। शास्त्रार्थ व मीमांसा हमारी परंपरा है।
श्री पुण्डरीक गोस्वामी जी ने कहा कि जैसे-जैसे विज्ञान का विकास होता है, वैसे-वैसे उसे कहने का स्वरूप बदल जाता है। उन्होंने कहा कि पहले गुरु अपने शिष्यों को गुरुदक्षिणा के रूप में कान में ऐसा मंत्र देते थे कि सारा डेटा ट्रांसफर हो जाता था। पहले ज्ञान पात्रों के माध्यम से विवेक के साथ आता था। उन्होंने कहा कि हमारे ग्रंथ कल्पवृक्ष हैं। उन्हें जो पढ़ते हैं, वे अपनी पात्रता के अनुसार ग्रहण करते हैं। उन्होंने कहा कि माता के जैसी नींद व गुरु के जैसा जागृत करना कोई नहीं कर सकता। शास्त्रों का एआई मॉड्यूल तैयार करने का आह्वान किया, ताकि एआई सनातन शास्त्रों की सही व्याख्या प्रस्तुत कर सके।
पूज्य स्वामी भागवत स्वरूप जी महाराज ने कहा कि सनातन धर्म के लिए सभी पूज्य संतों को एकजुट होकर कार्य करना होगा।
कैवल्य पीठाधीश्वर पूज्य स्वामी अविचलदास जी महाराज ने कहा कि यह अनुष्ठान अत्यंत आवश्यक है, ताकि हमारी आगे आने वाली पीढ़ियों को सनातन धर्म की मूल शिक्षाओं का ज्ञान प्राप्त हो सके।
पूज्य स्वामी परमात्मानन्द जी महाराज ने कहा कि ग्रंथों में कालानुसार परिवर्तन हुए हैं। उन नियमों को भी रखें तथा ग्रंथों के मूल सिद्धांतों को रखना अत्यंत आवश्यक है। सनातन परंपरा वेद-केंद्रित रहे, व्यक्ति-केंद्रित न रहे। डिजिटल पोर्टल बनाने का आह्वान किया।
नाथ सम्प्रदाय के पूज्य स्वामी निर्मलानन्द जी महाराज ने कहा कि हमें अपनी जेन-जी जनरेशन को अपने शास्त्रों व धर्म के वास्तविक सत्य और मूल से जोड़ना होगा, तभी हम अपने धर्म को संरक्षित रख सकते हैं।
विश्व हिन्दू परिषद् के अध्यक्ष श्री आलोक कुमार जी ने कहा कि शास्त्रों में जो प्रक्षिप्त अंश हैं, उन्हें निकालने के साथ जो वेद-विरुद्ध है, उसे भी हटाना नितांत आवश्यक है।
आरएसएस के श्री रामलाल जी ने कहा कि जिस दिन भारत बड़ा होगा, उस दिन पूरे विश्व को शांति के लिए चिंतित होने की जरूरत नहीं होगी। भारत दुनिया की सुख-शांति की गारंटी देता है।
पूज्य स्वामी भद्रेश जी महाराज ने कहा कि हमारे सनातन धर्म के तीन स्तंभ है, शास्त्र, मंदिर और संत। शास्त्र हमारा प्राण है और शास्त्र ही हमारा आधार है। जो मूल नहीं है वह भूल है और उसे निकालना ही चाहिये। प्रक्षिप्त अंश का शुद्धिकरण होना ही चाहिये। सभी भारतीयों में भारत के प्रति गौरव हो। वैदिक सनातन धर्म के रक्षक के रूप में अपना परिचय होना चाहिये।
