खून के प्यासे ‘काले भूत’ कौन? रक्तदान व्यवस्था में पारदर्शिता और निगरानी पर उठ रही चर्चाएं।
हरिद्वार। धर्मनगरी हरिद्वार में समय-समय पर बड़ी संख्या में रक्तदान शिविर आयोजित किए जाते हैं। सामाजिक संस्थाएं, धार्मिक संगठन और विभिन्न मंच मानव सेवा के उद्देश्य से रक्तदान अभियान चलाते हैं। लेकिन इन सबके बीच एक सवाल लगातार चर्चा में बना रहता है कि रक्तदान के बाद रक्त की पूरी प्रक्रिया कितनी पारदर्शी है और उस पर निगरानी कितनी मजबूत है।रणदीप हुड्डा अभिनीत फिल्म लाल रंग ने वर्षों पहले अवैध रक्त कारोबार की एक ऐसी कहानी दिखाई थी, जिसने लोगों को सोचने पर मजबूर कर दिया था। फिल्म भले ही एक सिनेमाई प्रस्तुति थी, लेकिन उसने यह सवाल जरूर छोड़ा कि यदि निगरानी कमजोर हो जाए तो संवेदनशील व्यवस्थाओं का दुरुपयोग भी संभव है।
हरिद्वार में भी कुछ लोग अब प्रतीकात्मक रूप से ऐसे संदिग्ध तत्वों को “काले भूत” कहकर संबोधित कर रहे हैं। उनका कहना है कि रक्तदान जैसे पवित्र कार्य की आड़ में यदि कहीं भी अनियमितता होती है तो उसका खुलासा होना चाहिए। स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि रक्त संग्रह, भंडारण और वितरण की प्रक्रिया निर्धारित नियमों के तहत ही होनी चाहिए। केवल अधिकृत ब्लड बैंक ही रक्त का संग्रह और उपयोग कर सकते हैं। ऐसे में किसी भी प्रकार की शंका या शिकायत की जांच संबंधित विभागों द्वारा की जानी आवश्यक है।
धर्मनगरी में उठ रहे इन सवालों के बीच अब निगाहें इस बात पर हैं कि रक्तदान शिविरों की व्यवस्था, रिकॉर्ड और रक्त के उपयोग की प्रक्रिया कितनी पारदर्शी है। यदि कहीं कोई गड़बड़ी है तो उसका खुलासा होना चाहिए और यदि सब कुछ नियमों के अनुरूप है तो जनता का विश्वास और मजबूत होना चाहिए।फिलहाल सवाल बरकरार है – क्या रक्तदान शिविर केवल सेवा का माध्यम हैं, या फिर कहीं कुछ ऐसा भी है जिस पर पर्दा उठना बाकी है?
